मोदी सरकार का शिक्षा के निजीकरण का कुत्सित षड्यंत्र

मोदी सरकार का शिक्षा के निजीकरण का कुत्सित षड्यंत्र
नॉन नेट फ़ेलोशिप बन्द करने का विरोध करो!

दोस्तो,
7 अक्टूबर को यूनिवर्सिटी ग्राण्ट्स कमिशन (यूजीसी) ने नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट) पास करके न आने वाले छात्रों की फेलोशिप को ख़त्म कर दिया है। इससे एम.फिल. व पी.एच.डी. करने वाले छात्रों को जो फेलोशिप मिलती थी अब वह मिलनी बन्द हो जाएगी। अभी तक नेट की परीक्षा पास करके न आने वाले एम.फिल. के छात्रों को महीने में 5000 और पी.एच.डी. के छात्रों को महीने में 8000 रुपये की फेलोशिप मिलती थी। इसका सीधा-सीधा असर देशभर के छात्रों पर पड़ेगा और उनके लिए अपनी शिक्षा को जारी रख पाना बेहद मुश्किल हो जायेगा। सभी विश्वविद्यालयों समेत हमारे विश्वविद्यालय में भी छात्रों को बेहद दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा और ग़रीब घर से आने वाले छात्रों को तो पढ़ाई तक छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा। साफ़ नज़र आ रहा है कि कांग्रेस के बाद अब भाजपा सरकार शिक्षा के बाज़ारीकरण की नीतियों को और भी ज़ोर-शोर के साथ लागू कर रही है। इस घटना के विरोध में दिल्ली में यूजीसी के हेडक्वाटर्स पर छात्रों का संघर्ष जारी है।

एफटीआईआई के छात्रों के संघर्ष का साथ दो!

एफटीआईआई के छात्रों का संघर्ष हमारा संघर्ष है!
एफटीआईआई के छात्रों के संघर्ष का साथ दो!

साथियो!
आपको पता होगा कि एफटीआईआई (भारतीय फिल्म व टेलीविजन संस्थान), पुणे के छात्र पिछले करीब दो महीने से इस संस्थान को बर्बाद करने की फासीवादी साज़िशों के विरुद्ध लड़ रहे हैं। आपको यह भी पता होगा कि राधे माँ और आसाराम जैसे अपराधी पाखण्डी बाबाओं और माताओंके भक्त, हनुमान चालीसा यन्त्र जैसे फ्रॉड का प्रचार करने वाले, ‘खुली खिड़कीऔर जंगल लवजैसी सॉफ्ट पॉर्न फिल्मों में काम करने वाले गजेन्द्र चौहान को एफटीआईआई का अध्यक्ष बना दिया गया है, जिनका मानना है कि हर फिल्म जो कमाई कर ले वह ए-ग्रेड फिल्म होती है! आपको शायद यह भी पता होगा कि डॉक्युमेण्ट्री फिल्म और फीचर फिल्म में फर्क न जानने वाले लोगों को एफटीआईआई सोसायटी में घुसा दिया गया है! ऐसे में, इस शानदार संस्थान का भविष्य अन्धकार में पड़ गया है, जिसका रिश्ता कभी ऋत्विक घटक, अदूर गोपालकृष्णन, श्याम बेनेगल जैसे लोगों से रहा है। ये छात्र किसी विशिष्ट विचारधारा या राजनीति वाले व्यक्ति को संस्थान का अध्यक्ष बनाने के लिए नहीं लड़ रहे हैं, जैसा कि भाजपा सरकार प्रचार कर रही है! पहले भी भाजपा की विचारधारा से नज़दीकी रखने वाली तमाम हस्तियाँ, जैसे कि विनोद खन्ना, इस संस्थान की बागडोर सम्भाल चुकी हैं। इसके अलावा, कोई महामूर्ख ही कहेगा कि श्याम बेनेगल, अदूर गोपालकृष्णन, आदि वामपंथी या नक्सलाइट हैं! मगर ये सभी कम-से-कम वास्तविक कलाकार थे! अभी जिन लोगों को एफटीआईआई में घुसाया जा रहा है, उनके पास न तो फिल्म कला की कोई समझदारी है और न ही इस संस्थान की शानदार विरासत का वहन करने की योग्यता व दृष्टि। इसलिए, ये छात्र इस संस्थान को फिल्म-अज्ञानियों के हाथों तबाह होने से बचाने के लिए लड़ रहे हैं; ये छात्र अध्यक्ष से लेकर एफटीआईआई सोसायटी में नियुक्तियों की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए लड़ रहे हैं; ये छात्र एक शानदार विरासत को तुच्छता और अज्ञान के हवाले करने के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं! अगर एफटीआईआई की बागडोर ऐसे लोगों के हाथों में आयी तो यह शानदार कलात्मक व मनोरंजक फिल्मों बनाने वाले लोगों को तैयार करने वाले संस्थान की बजाय भाजपा सरकार के लिए प्रोपगैण्डा करने वाला संस्थान बन जायेगा। यह इस संस्थान की हत्या के समान होगा! इसलिए हम एफटीआईआई छात्रों के संघर्ष का दिली और पुरज़ोर समर्थन करते हैं!
साथियो! हमें यह भी समझना चाहिए कि संस्कृति और शिक्षा के संस्थानों को फासीवादी प्रचार का उपकरण बनाने का यह पहला और अन्तिम प्रयास नहीं है। इसके पहले भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद्का अध्यक्ष एक ऐसे व्यक्ति को बना दिया गया जो कि नरेन्द्र मोदी को ईश्वर का अवतार मानता है (मज़ाक में नहीं, बल्कि वाकई वह ऐसा मानता है!); यही हाल एनसीईआरटी का किया गया; राजस्थान की पाठ्यपुस्तकों में बलात्कार के आरोपी आसाराम बापू और अरबों का धन्धा करने वाले बाबा रामदेव को भारत में महान सन्तों में से एक बताया गया है! इन्हीं पाठ्यपुस्तकों से भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव ग़ायब हैं, जबकि संघ के नेताओं को महान शख़्सि‍यत के तौर पर चिन्हित किया गया है, जिनका स्वतन्त्रता के संघर्ष में कोई योगदान नहीं था! उल्टे संघ ने अंग्रेज़ों के सामने पलक-पाँवड़े बिछाने का ही काम किया! अपने ही इतिहास से डरे हुए संघ परिवार के लोगों ने सत्ता में आते ही उस इतिहास को विकृत करने का काम शुरू कर दिया है! चाहे शिक्षा के संस्थान हों या फिर संस्कृति के संस्थान, सभी को योजनाबद्ध तरीके से भगवा रंग में रंगा जा रहा है। अभी एफटीआईआई का नम्बर है, लेकिन कल सभी शैक्षणिक संस्थानों और कलात्मक संस्थाओं के साथ भाजपा की नरेन्द्र मोदी सरकार यही करने वाली है। महाराष्ट्र और गोवा में भी यदि कला अकादमियों, नाट्य संस्थानों और साहित्यिक निकायों के छात्र, शिक्षक और सदस्य आज ही आवाज़ नहीं उठाते, आज ही अगर हम एफटीआईआई के अपने संघर्षरत साथियों के साथ खड़े नहीं होते, तो कल हमारे साथ भी यही सांस्कृतिक दुराचार होने वाला है।
इसलिए हमें निम्न प्रकार से एफटीआईआई के साथियों की मदद करनी चाहिएः
1. हमें अपने-अपने विश्वविद्यालयों, कला अकादमियों, विभागों आदि में एफटीआईआई के छात्रों के समर्थन में एक, तीन या पाँच दिनों की प्रतीकात्मक हड़ताल या फिर वॉक आउटका आयोजन करना चाहिए। हम यह बात सिर्फ छात्रों से नहीं बल्कि शिक्षकों से भी कह रहे हैं।
2. हमें अपने प्रतिनिधि-मण्डल तैयार करके एफटीआईआई, पुणे भेजना चाहिए और वहाँ के छात्रों को अपना नैतिक और भौतिक समर्थन प्रदान करना चाहिए।
3. हम एफटीआईआई के छात्र साथियों से भी अपील करते हैं कि वे एफटीआईआई में एक राष्ट्रीय एकजुटता प्रदर्शन रखें जिसमें वे उन सभी संगठनों और व्यक्तियों को बुलायें जो कि इस संघर्ष का समर्थन करते हैं।
4. सभी सरोकारी व्यक्तियों व संगठनों को भाजपा सरकार को विरोध-पत्र फैक्स करना चाहिए।
5. सभी शहरों से प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों, आदि के बीच हस्ताक्षर करा कर विरोध-पत्र को भाजपा सरकार को भेजा जाना चाहिए।
साथियो! याद रखें कि यह संघर्ष अभी एफटीआईआई में हो रहा है, मगर इसका यह अर्थ नहीं कि यह केवल एफटीआईआई का संघर्ष है! यह हम सबका संघर्ष है शिक्षा और कला को भगवा फासीवादी प्रचार का यन्त्र बना देने की साज़िश के ख़िलाफ़! हम आज अपने एफटीआईआई के साथियों के साथ नहीं खड़े होते तो कल बहुत देर हो जायेगी और कल हमारी बारी आयेगी! इसलिए हम मुम्बई विश्वविद्यालय के सभी छात्र-छात्राओं व सच्चे शिक्षकों का आह्वान करते हैं कि 18 अगस्त, मंगलवार को सभी एक दिन का सांकेतिक समर्थन वॉक-आउट करते हुए, कालीना कैम्पस के गेट पर सुबह  11 बजे एकत्र हों!

इंक़लाब ज़िन्दाबाद!
सभी छात्रों, शिक्षकों, कलाकर्मियों, संस्कृतिकर्मियों की एकता ज़िन्दाबाद!

यूनीवर्सिटी कम्युनिटी फॉर डेमोक्रेसी एण्ड इक्वॉलिटी (यूसीडीई)

सम्पर्कः नारायण 9769903589 ईमेल: ucde.mu@gmail.com ब्लॉग: ucde-mu.blogspot.com

एफटीआईआई के साथियों का संघर्ष ज़ि‍न्दाबाद!

एफटीआईआई के साथियों का संघर्ष ज़ि‍न्दाबाद!
वो डरते हैं हमारे गीतों से---और हमारी चुप्पी से!

साथियो!
कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र हमेशा से ही बर्बरों के निशाने पर रहे हैं। कला पर हमले के कई तरीके होते हैं। एक तरीका यह है कि कलाकृतियों, मूर्तियों, फिल्मों, किताबों को नष्ट कर दिया जाय। दूसरा तरीका होता है कलात्मक रचनाओं का सृजन करने वाली संस्थाओं का सिरमौर गजेन्द्र चौहान जैसे व्यक्तियों को बना दिया जाय। एफटीआईआई ने हमारे देश को तमाम प्रगतिशील और जनवादी फिल्मकार दिये हैं। उनकी कलात्मक रचनाओं ने कई पीढ़ियों को मानवीय सारतत्व से परिचित कराने का काम किया है। शायद यही कारण है कि आज सत्ता पर काबिज़ फासीवादी ताक़तें किसी भी कीमत पर इस संस्थान की अगुवाई एक थर्ड-ग्रेड अश्लील फिल्मों के अभिनेता को सौंपना चाहती हैं! लेकिन एफटीआईआई के हमारे युवा साथियों के संघर्ष ने देश भर के युवा कलाकारों को प्रेरणा और उत्साह प्रदान किया है। मुम्बई विश्वविद्यालय के हम छात्र भी आज कदम-कदम पर फासीवादी ताक़तों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं और हमें आपकी लड़ाई से बहुत ताक़त मिली है। हम आपसे पुरज़ोर शब्दों में तहे-दिल से कहना चाहते हैं: चाहे जो भी हो साथियो! डटे रहना! हम तुम्हारे साथ हैं!
दोस्तो! यह सोचने की बात है कि फासीवादी भगवा गिरोह नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में सत्ता में आने के साथ ही कला, साहित्य, संस्कृति, शिक्षा आदि के तमाम संस्थानों के भगवाकरण को क्यों अंजाम दे रहा है? पहले एन.सी.ई.आर.टी. के पाठ्यक्रम को बदलना, फिर भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्, उसके बाद तमाम अन्य अनुसंधान संस्थान और अब एफटीआईआई! वे कला और इतिहास से इस कदर डरे हुए क्यों हैं? कारण यह है कि इतिहास भी उनका शत्रु है क्योंकि यह इन हाफ-पैण्टियों की पूरी जन्मकुण्डली खोल कर रख देता है, और सच्ची कला भी उनकी शत्रु है क्योंकि सच्ची कला मानवीय सारतत्व की नुमाइन्दगी करती है, यानी हर वह उत्कृष्ट चीज़ जो इंसान ने पैदा की है। यही कारण है कि दुनिया के हर देश में फासीवादी कलाकारों पर हमले करते हैं, कलात्मक संस्थानों पर कब्ज़ा जमाते हैं, संगीतकारों की हत्याएँ करते हैं, फिल्मकारों को कारागार में धकेल देते हैं। जब मुसोलिनी ने फेदेरिको गर्सिया लोर्का को गाते हुए सुना तो उसने कहा था कि इस आवाज़ को जितनी जल्दी हो सके शान्त कर देना होगा!
जर्मन चिन्तक वॉल्टर बेंजामिन ने एक बार कहा था कि फासीवाद राजनीति का सौन्दर्यीकरण करता है और क्रान्तिकारी सौन्दर्यशास्त्र का राजनीतिकरण करके जवाब देता है। फासीवाद के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह कला, फिल्म, संगीत आदि क्षेत्रों पर कब्ज़ा करे। क्योंकि ये क्षेत्र राजनीति के सौन्दर्यीकरण, मिथकों की रचना और फिर इन मिथकों को सामान्य-बोध के रूप में स्थापित करने के प्रमुख उपकरण बनते हैं। एफटीआईआई पर मौजूदा हमला कोई अलग-थलग अकेली घटना नहीं है। यह एक ट्रेण्ड का हिस्सा है। यह एक फासीवादी राजनीतिक एजेण्डा का अहम हिस्सा है, ठीक उसी प्रकार जिस तरह से मज़दूरों और ग़रीब किसानों के हक़ों पर हमला और अम्बानियों-अदानियों के लिए देश को लूट की खुली चरागाह बना देना भी इस फासीवादी एजेण्डा का अहम अंग है। हमारी लड़ाई भी अलग-थलग नहीं रह सकती है। बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ने 1937 में लिखा था, “हमें तुरन्त या सीधे तौर पर इस बात का अहसास नहीं हुआ कि यूनियनों और कैथेड्रलों या संस्कृति की अन्य इमारतों पर हमला वास्तव में एक ही चीज़ था। लेकिन ठीक यही जगह थी जहाँ संस्कृति पर हमला किया जा रहा था।----अगर चीज़ें ऐसी ही हैं---अगर हिंसा की वही लहर हमसे हमारा मक्खन और हमारे सॉनेट्स दोनों ही छीन सकती है; और अगर, अन्ततः, संस्कृति वाकई एक इतनी भौतिक चीज़ है, तो इसकी हिफ़ाज़त के लिए क्या किया जाना चाहिए?” और अन्त में ब्रेष्ट स्वयं ही इसका जवाब देते हैं, “---वह संस्कृति महज़ केवल किसी स्पिरिट का उद्भव नहीं है बल्कि सबसे पहले यह एक भौतिक चीज़ है। और भौतिक हथियारों के साथ ही इसकी रक्षा हो सकती है। दोस्तो, ये शब्द आज भी सच हैं। आप भी समझते हैं कि हमारी लड़ाई केवल एक संस्थान या एक अनुसन्धान परिषद् तक सीमित नहीं रह सकती है। आज उनके निशाने पर एफटीआईआई है, कल उनके निशाने पर कला अकादमियाँ होंगी, परसों कला संग्रहालय और उसके बाद हर विश्वविद्यालय और संगीत संस्थान!
इसलिए हमें संगठित होना ही होगा। कला की दुनिया पर बर्बरों का हमला शुरू हो चुका है। यह हमला हर उस चीज़ पर हमला है जो सुन्दर है, जो संवेदनशील है, जो न्यायप्रिय है, जो मानवीय है, जो समानतामूलक है। एक कलाकार के तौर पर हमें भी अपना पक्ष चुन लेना है! हमें भी हर उस ताक़त के साथ एक होना चाहिए जो इन फासीवादी बर्बरों के निशाने पर है! क्योंकि यह कोई आम बर्बरता नहीं है। जब हिटलर के काल के कई कलाकार नात्सियों की बर्बरता पर चकित थे और इस बर्बरता पर चर्चा कर रहे थे तो ब्रेष्ट ने कहा था, “बर्बरता से बर्बरता नहीं पैदा होती। बर्बरता उन सौदों से पैदा होती है जिनके लिए बर्बरता की ज़रूरत होती है।” कारपोरेट घरानों की बेशर्मी से सेवा करने और इस देश के मज़दूरों-मेहनतकशों को तबाहो-बर्बाद करने के लिए यह अनिवार्य है कि फासीवादी संघ परिवार देश के आम मध्यवर्ग में एक राय का निर्माण करे। उसके लिए कला, साहित्य, शिक्षा, अकादमिक जगत और संस्कृति के हर शिखर पर वह कब्ज़ा जमाये! आप लोगों की रचनात्मकता इस काम में फासीवादियों के लिए बाधा है और इसीलिए इस समय आप उनके निशाने पर हैं साथियो! हमारी लड़ाई भी इस पूरे ख़तरनाक एजेण्डा के ख़ि‍लाफ़, समूची फासीवादी सत्ता, विचारधारा, राजनीति और “संस्कृति” के ख़ि‍लाफ़ होनी चाहिए। उस सूरत में हम ज़रूर जीतेंगे! हम मुम्बई विश्वविद्यालय के छात्र अपने संगठन यूनीवर्सिटी कम्युनिटी फॉर डेमोक्रेसी एण्ड इक्वॉलिटीके ज़रिये आपको भरोसा दिलाना चाहते हैं कि हम हर कदम पर आपके साथ हैं!

इंक़लाबी सलाम के साथ,

यूनीवर्सिटी कम्युनिटी फॉर डेमोक्रेसी एण्ड इक्वॉलिटी (UCDE)

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Long Live the Struggle of our friends of FTII!

Long Live the Struggle of our friends of FTII!
They are scared of our songs...and of our silence too!
Friends and Comrades!
The arena of art and culture has always remained one of the prime targets of the Barbarians. Attacks on art take myriad forms. One of them is to destroy works of art, statues, films, books, etc. The other and more effective way to attack art is to put people like Gajendra Chauhan at the top of premiere institutions of art and culture. FTII has given us numerous progressive and democratic film-makers. Their work of art has introduced a number of generations to human essence. Probably that is the reason why the Fascist forces in power want to hand over the leadership of such an institute to an "actor" of C-grade soft-porn movies! However, the struggle of our young friends of FTII has instilled young artists of entire country with inspiration and enthusiasm. We, the students of Mumbai University also have fought and are fighting against the Fascist forces at every step and we have learnt a lot from your struggle. Let us take this opportunity to say to you with all our heartfelt feelings: Come what may! Don't give up, comrades! We are with you!
Friends! It is worthy of our consideration why the Fascist saffron gang under the leadership of Narendra Modi has begun its project of saffronization of various institutions of art, literature, culture, eductation etc as soon as it came to power? First they changed the NCERT curriculum, then destroyed Indian Council of Historical Research and other research institutions and now they have fixed their eyes on FTII! Why the hell are they so scared of art and history? The reason for this is the fact that history is their enemy as it exposes their entire geneology, and true art also is their nemesis as it represents human essence, that is, every refined and beautiful thing that humanity has produced. That is the reason why Fascists all over the world attack artists, try to hegemonize institutions of art and culture, murder musicians and imprison film-makers. When Mussolini heard Federico Garcia Lorca singing he said that this voice must be silenced as soon as possible!
German thinker Walter Benjamin had once said that Fascism aesthetizes politics and the revolutionary responds by politicizing aesthetics. It is essential for Fascism to take over the spheres of art, film, music etc. Because these spheres become the principal instruments for the aesthetization of politics, creations of myths and turning of these myths into common-sense. The assault on FTII is not an isolated event but a part of a sinister trend. It is an important part of the Fascist agenda, precisely like attack on the rights and livelihood of workers and poor peasants and making the entire country a grazing ground for open loot and plunder of Ambanis-Adanis. Consequently, our struggle also cannot be isolated. Bertold Brecht wrote in 1937, "We didn’t realize quickly or directly enough that the destruction of unions and that of cathedrals and other monuments of culture meant the same thing. And yet that was precisely where culture was attacked...If this is the way things are...if one and the same wave of violence can take from a people both butter and sonnets; and if, finally, culture is something so truly material, what must be done to defend it?" And finally Brecht himself answers this cardinal question, "...that culture is itself not only an emanation of the spirit but also and above all a material thing. And it is with material weapons that it must be defended." Friends, these words are as true as ever. You too understand that our fight cannot be limited to one institution or research council. Today, FTII is their prime target, tomorrow it will be the art academies and the day after it will be every museum, art gallery, universtiy and music institutes!
And that is why we must organize! The invasion of the barbarians has begun. This attack is on everything that is beautiful, that is sensitive, that is justice-loving, that is humane, that is egalitarian! As as artist we must decide where do we stand! We should unite with each and every force that is being targeted by these Fascist barbarians! This is no common barbarism. When various artists were stupefied by the sheer scale of barbarism committed by the Nazis and were discussing this barbarism, Brecht had famously commented, "Brutality does not come from brutality, but from the business deals which can no longer be made without it." In order to shamelessly server the corporate houses and to destroy the lives of millions of toiling masses, it is necessary for the Fascist Sangha Parivaar to build opinin in the middle classes of the country. And in order to do so, it is imperative for it to hegemonize every summit of art, literature, education, academics and culture! Your creativity, our friends, is an impediment in the way of the Fascists and that is why you are on their hit-list! Therefore, our struggle too, must be directed against this entire dangerous agenda, entire Fascist state, ideology, politics and "culture". If we succeed in doing so ,we shall prevail! We, students of Mumbai University under the banner of our organization 'University Community for Democracy and Equality' assure you that you will find us besides you on every step!

With Revolutionary Greetings,

University Community for Democracy and Equality (UCDE)
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सांप्रदायिक फासीवाद्यांचे जनतेत फूट पाडण्याचे प्रयत्न हाणून पाडा

शहीदे-आजम भगतसिंहांच्या संदेशाचे स्मरण करा
सांप्रदायिक फासीवाद्यांचे जनतेत फूट पाडण्याचे प्रयत्न हाणून पाडा
जनतेची झुंजार एकता निर्माण करा

मित्रहो,
देशात पुन्हा एकदा जनतेमध्ये धर्माच्या नावाखाली फूट पाडण्याचे कारस्थान रचले जात आहे. देशभरात धार्मिक कट्टरतेच्या आगीला हवा दिली जात आहे. लोक महागाई, बेरोजगारी आणि गरीबीने ग्रासलेले असताना त्यांना रामजादेआणि हरामजादेयांच्यामध्ये विभागण्यात येते आहे. जेव्हा जनता दरवाढ, बेकारी आणि दारिद्र्याने हैराण असते त्याच वेळी अचानक लव जिहाद’, ‘घरवापसीआणि हिंदू राष्ट्र निर्माणाचे पिल्लू कां सोडले जाते, यावर आपण कधी विचार केला आहे? निवडणुका जवळ येतात त्याच वेळी दंगे कां भडकतात? जनता महागाई आणि भ्रष्टाचारामुळे हैराण झालेली असते त्याच वेळी सांप्रदायिक तणाव कां भडकतो? हा केवळ योगायोग आहे का? ज्यामध्ये तोगडिया, ओवेसी, सिंघल किंवा योगी आदित्यनाथ यांच्यासारखे लोक मारले गेले आहेत, असा स्वातंत्र्यानंतरच्या काळातील एक तरी दंगा आपल्याला आठवतो का? दंग्यांमध्ये कधी कुठल्या कट्टर नेत्याचे घर जळाले आहे का? नाही! दंग्यांमध्ये नेहमीच तुमच्या-आमच्यासारखे लोकच मारले जातात, बेघर होतात, अनाथ होतात. होय! आपल्यासारखेच लोक जे आपल्या मुलाबाळांना एक चांगले जीवन देण्यासाठी काबाडकष्ट करीत असतात. ज्यांच्या ताटांमधून एक एक करून भाजी, डाळ गायब होते आहे. ज्यांची तरुण मुले रस्त्यांवर बेरोजगार फिरत आहेत. ज्यांचे भविष्य अधिकाधिक अनिश्चित होते आहे, जे सतत बरबादीच्या दरीत कोसळत आहेत. जेव्हा आपला संयम तुटायची वेळ येते त्याच वेळी मंदिर आणि मशिदीचा मुद्दा उचलला जातो. देशातील धनिकांच्या, अमीरजाद्यांच्या आणि दैत्याकार कंपन्यांच्या पैशांवर चालणारे तमाम राजकीय पक्ष त्याच वेळी धार्मिक कट्टरता भडकवतात. हिंदूंना मुसलमानांचे आणि मुसलमानांना हिंदूंचे शत्रू बनवले जाते आणि आपापसात लढविले जाते. आणि आपण लढतो, हा आपला मूर्खपणा आहे. दंगे होतात, सामान्य माणसं मरतात, आणि सामान्य लोकांच्या चितांवर देशातील अमीरजादे व त्यांचे पक्ष आपल्या पोळ्या भाजून घेतात.
कोणाचे ‘‘अच्छे दिन’’ आणि कोणाचा ‘‘विकास’’?

जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र साथियो! हम तुम्हारे साथ हैं!

जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र साथियो! हम तुम्हारे साथ हैं!

दोस्तो!
जादवपुर विश्वविद्यालय में पिछले कई महीनों से छात्र शानदार संघर्ष चला रहे हैं। अगस्त महीने में एक छात्र के साथ हुई छेड़खानी के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने आरोपियों पर कोई भी कार्रवाई नहीं की। जब छात्रों ने कुलपति और रजिस्ट्रार का घेराव करके इंसाफ़ की माँग की तो रात 2 बजे छात्रों को पुलिस और गुण्डों द्वारा पिटवाया गया। पुलिसकर्मियों द्वारा छात्राओं के साथ बदसलूकी की गयी और तमाम छात्रों को गिरफ्तार किया गया। तब से छात्र लगातार दोषियों को सज़ा दिलवाने और कुलपति के इस्तीफे की माँग कर रहे हैं। इस 5 जनवरी से 12 छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन अपने हिटलरी रवैये को बनाये हुए है।
जादवपुर विश्वविद्यालय की घटना कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान विश्वविद्यालय कैम्पसों में जनवादी स्पेस लगातार कम होता गया है। आज़ादी और जनवाद के लिए मशहूर रहे जादवपुर विश्वविद्यालय, जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, मुम्बई विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालयों में भी आज छात्रों का पुलिस, गुण्डों और प्राईवेट “सिक्योरिटी” द्वारा दमन किया जा रहा है। अगर हम एक विचार-विमर्श, अध्ययन चक्र, मूवी शो, गोष्ठी, नुक्कड़ नाटक तक करना चाहें तो विश्वविद्यालय प्रशासन इसकी इजाज़त नहीं देता! मुम्बई विश्वविद्यालय में पिछले वर्ष एक शिक्षक को विश्वविद्यालय प्रशासन ने निलम्बित कर दिया था क्योंकि उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन के भ्रष्टाचार पर सवाल खड़ा किया था। बाद में यूसीडीई के बैनर तले इसके ख़ि‍लाफ़ शानदार छात्र आन्दोलन चलाया और प्रशासन को मजबूर होकर उन्हें वापस लेना पड़ा। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय में भी जायज़ हक़ों के लिए संघर्षरत छात्रों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। विश्वविद्यालय कैम्पस आज पुलिस छावनी नज़र आने लगे हैं। हम छात्रों पर इस तरह नज़र रखी जाती है मानो हम कोई अपराधी हों या समाज के लिए कोई ख़तरा हों, जबकि असली गुण्डे-अपराधी-भ्रष्टाचारी संसद-विधानसभाओं में बैठते हैं और वी-सी- से लेकर पुलिस और नौकरशाह तक उन्हें सलाम ठोंकते हैं! आख़ि‍र क्या कारण है कि इस तरह कैम्पसों से लगातार जनवादी स्पेस खत्म किया जा रहा है क्या कारण है कि कैम्पसों में पुलिस की मौजूदगी लगातार बढ़ती जा रही है
दरअसल, पिछले दो दशकों के दौरान सरकार ने लगातार शिक्षा का बाज़ारीकरण किया है। 1986 में नयी शिक्षा नीतिऔर फिर 1990 में नयी आर्थिक नीतिके लागू होने के बाद से लगातार शिक्षा को बाज़ारू माल बनाया जा रहा है। कॉलेज व हॉस्टल की सीटें लगातार सापेक्षिक रूप से कम हो रही हैं, फीसें लगातार बढ़ रही हैं, कैण्टीन में खाना लगातार महँगा होता जा रहा है, सभी अच्छे व पेशेवर पाठ्यक्रमों को स्ववित्तपोषित (Self-financed) बनाया जा रहा है। जो युवा चाँदी का चम्मच मुँह में लेकर पैदा नहीं हुए उनके लिए उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाना लगातार अधिक से अधिक मुश्किल होता जा रहा है। ज़ाहिर है, आम घरों से आने वाले छात्र और हर इंसाफ़पसन्द छात्र यूँ ही चुपचाप बैठकर सबकुछ सहते नहीं रहेंगे और अपनी आवाज़ उठाएँगे।
इसके अतिरिक्त, विश्वविद्यालय ही वे जगहें होती हैं जहाँ हम इंसाफ़, बराबरी, जनवाद, भाईचारे, स्त्री-पुरुष समानता, सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों को सीखते और आत्मसात करते हैं; विश्वविद्यालयों में ही यह विचार पनपा कि अन्याय के विरुद्ध विद्रोह न्यायसंगत है! आज के हुक्मरान जो देश भर में जनविरोधी नीतियाँ लागू कर रहे हैं, जो अदानी-अम्बानी के हाथों बिके हुए हैं, जो भ्रष्टाचार में सिर से पाँव तक डूबे हैं, जो आज देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं, जो जनता पर हिटलरी तानाशाही थोप देना चाहते हैं; वो डरते हैं कि जनता कल यह बोल उठेगी कि बस! अब बहुत हुई यह तानाशाही, यह लूट, यह अमीरपरस्ती, यह अन्याय!वो डरते हैं और इसीलिए आज विश्वविद्यालय में मौजूद जनवादी स्पेस को ख़त्म करना चाहते हैं, क्योंकि यहीं विद्रोह की आग सुलगती है! क्योंकि हम नौजवान ही इतिहास की दिशा को बदलने वाली अगुवा ताक़त हैं! इसीलिए वो हमसे तालीम, रोज़गार, मुख़ालफ़त करने, प्यार करने, गीत गाने और साँस लेने तक की आज़ादी को छीन लेना चाहते हैं।
इसीलिए आज देश के हुक्मरान हमें दबाने और कुचलने के अपने औज़ारों की धार तेज़ कर रहे हैं। जादवपुर के हमारे बहादुर दोस्त इसी साज़िश का डटकर मुकाबला कर रहे हैं! इसलिए हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उनके साथ एकजुटता ज़ाहिर करें। हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उन्हें यहाँ अपनी आवाज़ उठाकर ताक़त और ऊर्जा दें।

छात्र एकता ज़िन्दाबाद! जादवपुर के छात्रों का संघर्ष ज़िन्दाबाद!
अंधकार का युग बीतेगा! जो लड़ेगा वो जीतेगा!
होक्कोलोरबसे होबिप्लबकी ओर!

यूनीवर्सिटी कम्युनिटी फॉर डेमोक्रेसी एण्ड इक्वॉलिटी (यूसीडीई)

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