बंगलुरु और दिल्ली की घटनाएँ: नवउदारवादी भारत के लम्पट नवधनाढ्य वर्गों के आपराधिक चरित्र का नतीजा

बंगलुरु और दिल्ली की घटनाएँ: नवउदारवादी भारत के लम्पट नवधनाढ्य वर्गों के आपराधिक चरित्र का नतीजाअभी अगर हम उठे नहीं तो जुल्म बढ़ता जायेगा!

दोस्तो!
नववर्ष की पूर्वसंध्या पर बंगलुरु और दिल्ली के मुखर्जी नगर में व्यापक पैमाने पर हुई छेड़छाड़ की घृणास्पद घटनाओं ने हरेक सोचने-समझने वाले इंसान की अन्तरात्मा को झकझोर कर रख दिया। हर संवेदनशील व्यक्ति इन घटनाओं पर गुस्से और आक्रोश से भरा हुआ है। इन घटनाओं ने हमारे समाज की पोर-पोर में समायी पितृसत्तात्मक मानसिकता की पाशविकता को उजागर किया है। शहरों में बसने वाला नवउदारवादी, आधुनिक और शिक्षित” नवधनाढ्य और उच्च मध्यवर्ग का दोगला चरित्र भी इन घटनाओं ने उजागर कर दिया है। एक ओर ग्लोबल ब्राण्ड्स के कपड़ों, जूतों, गाड़ियों और साज़ो-सामान से लैस यह वर्ग किस कदर निरंकुश, गैर-जनवादी, स्त्री-विरोधी, मज़दूर-विरोधी है, इसकी बानगी अक्सर देखने को मिलती है। लेकिन नये साल की पूर्वसंध्या पर बंगलुरु और दिल्ली में हुई सामूहिक छेड़खानी और पुलिस द्वारा रोके जाने पर पुलिस के ऊपर भी हमले की वारदातों ने इस पूरे वर्ग के आपराधिक और लम्पट चरित्र को अभूतपूर्व रूप से नंगा किया है।
इन घटनाओं के बाद पुलिस प्रशासन भी कुछ खास नहीं कर सका है। इसकी उम्मीद की जा सकती है कि वह कुछ खास कर भी नहीं पायेगा। कारण यह कि सड़कों पर खाते-पीते घरों की “बिगड़ी औलादें”, तरह-तरह के दलाल, नौकरशाहों-मन्त्रियों के रिश्तेदार या उनसे रिश्ते रखने वाले, बड़े व्यापारियों, डीलरों, कुलकों-धनी किसानों की औलादें थीं। अगर कभी मज़दूर या आम युवा, स्त्रियाँ, मेहनतकश दलित अपने जायज़ हक़ों को लेकर भी सड़कों पर उतरते हैं, तो पुलिस को लाठी-चार्ज करते, आँसू गोले फेंकने में वक़्त नहीं लगता! तुरन्त ही सीआरपीएफ़ और आरएएफ़ की बटालियनें बुला ली जाती हैं और अपने जायज़ हक़ों के लिए लड़ते युवाओं, मज़दूरों, औरतों, दलितों पर सत्ता अपना कहर बरपाती है। लेकिन जब नवधनाढ्यों की औलादें मिलकर सड़क पर उत्पात मचाती हैं, लड़कियों को स्कूटरों से खींचती हैं, बदतमीज़ी करती हैं तब पुलिस असहाय होती है और यहाँ तक कि उनके हाथों पिटती है और भाग खड़ी होती है! क्योंकि पुलिस के आम कांस्टेबल भी जानते हैं कि इस भीड़ में नेता-मन्त्रियों-नौकरशाहों या उनसे ताल्लुक रखने वाली बड़ी आसामियों के लड़के हैं! इसलिए पुलिस ज़्यादा से ज़्यादा उन्हें “समझाने” का प्रयास करती है और जब वे नहीं समझते तो पुलिस खुद ही “समझ” जाती है।
दोस्तो! साथियो! यह समझना ज़रूरी है कि ये घटनाएँ अपवाद नहीं है। ये घटनाएँ इस नवधनाढ्य वर्ग के असली चरित्र को दिखलाती हैं। ये वह वर्ग है जिसके पास पिछले तीन दशकों में यानी नवउदारवादी नीतियों के श्रीगणेश होने के बाद अचानक ढेर सारा पैसा आ गया है। यह अचानक अमीर बना वर्ग स्वयं अपनी समृद्धि से भौंचक्का है और उसके उन्माद में है। उसे लगता है कि वह पैसे से सबकुछ खरीद सकता है। वहीं बाज़ारू और औरतों को माल के तौर पर पेश करने वाली कारपोरेट पूँजीवादी संस्कृति ने इंसान और सामान के बीच का अन्तर इन नवधनाढ्यों के लिए खत्म कर दिया है। यह औरतों को भी मांस के एक पिण्ड से ज़्यादा कुछ नहीं समझते। इनके नायक हैं यो यो हनी सिंह, बादशाह जैसे घृणास्पद बाज़ारू गायक जिनके गीतों में एक मानवीय देह की तुलना गाड़ियों और अन्य कन्ज़्यूमर सामानों के साथ आम तौर पर देखी जा सकती है। यही बताता है कि स्त्री उनके लिए एक भोग की वस्तु से ज़्यादा कुछ नहीं है। इस नवधनाढ्य वर्ग के अन्दर एक पाशविक, उन्मादी और बर्बर किस्म का अधिकार-बोध है जिसके अनुसार उसे लगता है कि चूँकि उसके पास पैसा है कि इसलिए वह कुछ भी हासिल कर सकता है। पितृसत्ता और पूँजीवाद के नापाक गठजोड़ को सबसे ज़्यादा बर्बर, आक्रामक और जुगुप्सित रूप में यही वर्ग पेश करता है। निश्चित तौर पर, पितृसत्तात्मक मूल्यों की पैठ आम मेहनतकश आबादी में भी है और विशेष तौर पर लम्पट सर्वहारा वर्ग (यानी, जो वर्ग चेतना से रिक्त है), लम्पट टटपुँजिया वर्ग में इसके सबसे घिनौने रूपों को देखा जा सकता है। लेकिन इस गंगा की गंगोत्री देश के पूँजीपति वर्ग, विशेष तौर पर नवधनाढ्य वर्ग की सत्ता और संस्कृति में है। ज़ाहिर है, जिसके पास मीडिया, शिक्षा तन्त्र और सूचना तन्त्र का नियन्त्रण होगा, उसके ही मूल्य, मान्यताएँ और संस्कृति समाज के अन्य वर्गों पर भी हावी होंगे, जब तक कि उन अन्य वर्गों के पास कोई क्रान्तिकारी सांस्कृतिक विकल्प न हो। साथ ही, पितृसत्ता का मसला केवल मानसिकता, संस्कृति, और मूल्य-मान्यताओं का मसला नहीं है। यह वास्तव में एक राजनीतिक मसला है और यह राजनीतिक सत्ता के सवाल से जुड़ा हुआ है! पितृसत्ता को पालने-पोसने का काम मौजूदा पूँजीवादी सत्ता तन्त्र ही करता है। इसलिए पितृसत्ता के ख़िलाफ़ हम तभी प्रभावी तौर पर लड़ सकते हैं जब इसे खाद-पानी देने वाली समूची मौजूदा सत्ता के ख़िलाफ़ भी लड़ें! इसलिए साथियो, यह ज़रूरी है कि अपनी लड़ाई को महज़ कैम्पस के दायरे में सीमित न रखें! इसे उन तमाम रिहायशी इलाकों तक ले जाया जाय, जहाँ प्रतिक्रिया के ये गढ़ फल-फूल रहे हैं और वहाँ अपनी बहनों, अपने साथियों को अपने पक्ष में खड़ा किया जाय। हम हर-हमेशा कैम्पस में नहीं रहने वाले। अपनी लड़ाई को कैम्पस तक सीमित रखना आत्मघाती होगा।
जहाँ तक आज अपनी आज़ादी, अपनी हिफ़ाज़त और अपनी गरिमा के लिए लड़ने का प्रश्न है, तो एक बात इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दी हैः हम पुलिस प्रशासन के भरोसे रहकर इन आपराधिक तत्वों से लड़ने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। जब पुलिस इनसे डरकर खुद ही भाग खड़ी होती है, तो वह हमारी सुरक्षा कैसे कर सकती है? हमें स्वयं संगठित होना होगा, गोलबन्द होना होगा और अपनी आज़ादी, सुरक्षा और गरिमा के लिए खुद लड़ना होगा! अगर हम ऐसा नहीं करते तो कल हमारा अपनी पसन्द से जीना, पहनना, खाना-पीना, जीवनसाथी का चुनाव करना भी असम्भव हो जायेगा। हमें आज ही इस पर फैसला लेना होगा! कल बहुत देर हो जायेगी! हमारा यह प्रस्ताव है कि हम जल्द-से-जल्द एक जुलूस का आयोजन करें और उस जुलूस को कैम्पस के भीतर से निकालते हुए कैम्पस के आस-पास के तमाम इलाकों में ले जाया जाय और पब्लिक स्पेस पर अपना दावा ठोंका जाय। नववर्ष की पूर्वसंध्या पर जो घटना हुई है, उसके जवाब में अगर हम यह नहीं करते, तो इन आपराधिक, पतित और स्त्री-विरोधी नवधनाढ्य वर्गों का मन बढ़ता जायेगा। जड़त्व को तोड़ो साथियो! बेड़ियों को तोड़ो, बहनो! अगर तुम्हें लगता है कि हमें ऐसा करना चाहिए तो तुरन्त नीचे दिये नम्बरों पर कॉल करो।

अन्धकार का युग बीतेगा! जो लड़ेगा वो जीतेगा!संघर्षरत औरतों, छात्रों, युवाओं और मज़दूरों की एकता - ज़ि‍न्दाबाद!

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1 comment:

  1. Truly stated .... I m with you friends. India is with you.

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